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अनुशासन एवं अपील नियम

अनुशासन एवं अपील नियम


संगठन में अनुशासन बना रहे तथा कर्मचारियों का आचरण सभ्य रहे इसके लिए आचरण नियमों के साथ साथ अनुशासन एवं अपील नियमों का प्रावधान 1968 से लागू किया गया। इनका उद्देश्य कर्मचारियों को दण्ड का भय दिखाकर अनुशासित रखा जाए तथाकर्मचारियों को अपने आप को निर्दोष साबित करने का पूरा मौका दिया जाए और आवश्यक होने पर ही उन पर शास्ति लगाई जाए। ये नियम निम्नलिखित को छोड़कर सभी रेल कर्मचारियों पर लागू होते हैं -

  • अखिल भारतीय सेवा के सदस्य - इसमें महाप्रबन्धक तथा इससे ऊपर रेंकके अधिकारी सम्मिलित होते हैं।
  • आकस्मिक श्रमिक 
  • रेल सुरक्षा बल के सदस्य 
  • अनुशासन एवं अपील नियमों के  तहत कतिपय प्राधिकारियों को परिभाषित किया गया है।इनका विवरण इस प्रकार है -
नियुक्ति प्राधिकारी Click Here



अनुशासिक अधिकारी 

अनुशासिक अधिकारी वह होगा जिस  नियमों के अनुसार छोटी या बड़ी शास्ति लगाने का अधिकार होगा। अनुशासिक अधिकारी आरोप पत्र द सकता है वह कर्मचारी को दण्ड भी दे सकता है।
    जांच अधिकारी
    अनुशासिक अधिकारी जिस अधिकारी को अनुशासनिक कार्यवाही  मे जांच करने के लिए नामित करे वह जांच अधिकारी कहलाता है। यह निम्न हो सकते है-

    (1) अनुशासिक अधिकारी स्वयं

    (2) कोई एक अधिकारी

    (3) कोई एक पर्यवेक्षक या सयुक्त समिति

    आमतौर पर अनुशासिक अधिकारी को स्वयं जांच नहीं करके किसी दूसरे से जांच करवानी चाहिये।

    प्रस्तुति अधिकारीः प्रशासन का पक्ष प्रस्तुत करने के लिए, जांच के समय एक प्रस्तुति  अधिकारी नामित किया जा सकता है, रिकार्ड एवं कागजात पेश करने के अलावा उसे गवाहों से प्रष्न करने, जिरह करने, अन्त मे अपनी रिर्पोट जांच अधिकारी को दने का अधिकार है।
    अधिकतर यह विजिलेन्स और वरि॰ पुलिस म्जंइसपेीउमदज के मामलों में नामित किये जाते है। प्रस्तुति अधिकारी के कार्य सीमित होते है। वह जांच नही कर सकता है, परन्तु जांच अधिकारी दोनों कार्य कर सकता है।

    चार्ज शीट  - एक ऐसा विभागीय ज्ञापन, जो रेल कर्मचारी को उसके द्धारा गलत किये गये कार्यो के लिये दिया जाता है। इसका मुख्य उद्धेष्य यह है कि कर्मचारी अपने आप को बचाने की पूरी कोषिश करता है। इसमें कर्मचारी के विरूद्ध लगाये गये आरोप स्पष्ट होने चाहिये, उसमें घटना का पूरा विवरण, समय, स्थान, गवाह के नाम एवं दस्तावेजों का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिये।

    चेतावनी - चेतावनी कोई दण्ड नहीं है। यह एक प्रशासनिक प्रक्रिया है जिसमें कर्मचारी से स्पष्टीकरण लिया जाता है तथा भविष्य में उसकी पुनरावृति नहीं हो इसका उल्लेख करते हुए लिखित अथवा मौखिक रूप से चेतावनी दी जाती है। लिखित में चतावनी सर्विस रिकाॅर्ड में रिकाॅर्ड करने वाली अथवा व्यक्तिगत फाइल मे ं फाइल करने वाली रूप में होती है।

    मानक फाॅर्म

    अनशासनिक कार्यवाहियों के लिए मानक फाॅर्म:

    रेलवे में अनुशासनिक कार्यवाहियाँ लिखित में निर्धारित मानक फाॅर्मों पर की जाती है जिसका संक्षिप्त विवरण निम्नानुसार है -

    एस.एफ. - 1 - निलम्बन

    एस.एफ. - 2 - माना गया निलम्बन

    एस.एफ. - 3 - निर्वाह भत्ते की स्वीकृति

    एस.एफ. - 4 - निलम्बन से बहाली

    एस.एफ. - 5 - बड़ी शास्ति का आरोप पत्र

    एस.एफ. - 6 - दस्तावेजों के निरीक्षण की अनमति नहीं दने का आदेश

    एस.एफ. - 7 - जाँच अधिकारी की नियुक्ति

    एस.एफ. - 8 - प्रस्तुति अधिकारी की नियुक्ति

    एस.एफ. - 9 - ------हटा दिया गया है।-----

    यह फाॅर्म कारण बताओं के नोटिस के रूप काम में लिया जाता था। इसमें 9(ए), (बी), (सी) निर्धारित थे।

    एस.एफ. - 10 - संयुक्त कार्यवाही का आदेश

    10(ए) - संयुक्त कार्यवाही में जाँच अधिकारी की नियुक्ति

    10(बी) - संयुक्त कार्यवाही में प्रस्तुति अधिकारी की नियुक्ति

    एस.एफ. - 11 - छोटी शास्ति हेतु आरोप पत्र

    11(ए) - छोटी शास्ति पर बड़ी शास्ति की कार्यवाही

    11(बी) - परिशिष्ट - छोटी शास्ति में जाँच करने की कार्यवाही

    11(सी) - बड़ी शास्ति में छोटी शास्ति की कार्यवाही

    निलम्बन

    निलम्बन हमेशा  ड्यूटी या काम से होता है, कर्मचारी उसी पद पर नौकरी में तो रहता है परन्तु उसे काम करने या काम करने की जगह पर रहने की इजाजत नही होती है। यह दण्ड नही है एक प्रशासनिक कार्यवाही है। यह निम्न परिस्थितियों में किया जाता है-

    • जब कर्मचारी के विरूद्ध अनुशासनिक कार्यवाही की संभावना हो या बड़ी शास्ति की कार्यवाही चल रही हो।
    • जब कर्मचारी ऐसे कार्य कलापों मे लिप्त हो, जिससे दष की सुरक्षा को खतर हों।
    • जब किसी फौजदारी मामले मे कर्मचारी के खिलाफ कोई कस, छान-बीन, जांच या मुकदमें चल रहे हा।

    निम्न परिस्थितियों म  निलम्बन समझा जायेगा

    • यदि कर्मचारी 48 घण्टे से ज्यादा पुलिस हिरासत में रहा हो, तो हिरासत मे रखने की तारीख से।
    • जब कोई न्यायालय, कर्मचारी को पदच्युत करने, पद से हटाने या अनिवार्य रूप से 
    • सेवामुक्ति के दण्ड को अमान्य कर दे और जब अनुशासनिक अधिकारी आगे और जांच करने का निर्णय कर तो कर्मचारी को दिये गये दण्ड के आदेश की तारीख से निलम्बित समझा जायेगा या कर्मचारी की दण्ड के विरूद्ध अपील पर दबारा से जाँच के आदेश दिये गये हो तब भी दण्ड के आदेष की तारीख से निलम्बित समझा जायेगा।
    • जब कोई न्यायालय, कर्मचारी को पदच्युत करने, पद से हटाने या अनिवार्य रूप से सेवामुक्ति के दण्ड केा अमान्य कर दे और अब अनुषासनिक अधिकारी आगे और जांच करने का निर्णय कर  तो कर्मचारी के दिये गये दण्ड के आदेश की तारीख से कर्मचारी को निलम्बित समझा जायेगा या कर्मचारी की दण्ड के विरूद्ध अपील पर दण्ड अमान्य हो जायेगा तब भी दण्ड के आदेश की तारीख से निलम्बित समझा जायेगा।
    • कनिष्ठ प्रशासनिक अधिकारीयों को ग्रुप ‘सी’ एवं ‘डी’ के कर्मचारियों को निलम्बित करने का अधिकार है।
    • ग्रुप ‘बी’ अधिकारी उन ग्रुप ‘सी’ एवं ‘डी’ को निलम्बित कर सकता है जिनका वेतनमान 1800 रू या इससे कम हो।
    • स्वतन्त्र चार्ज रखने वाले ग्रुप ‘बी’ अधिकारी वेतन बैण्ड 9300-34800 व ग्रेड पे 4200 तक के कर्मचारियेां को निलम्बित कर सकते है।
    निलम्बन के दौरान मिलन वाले भत्ते -

    इस अवधि के दौरान कर्मचारी 50ः वेतन निर्वाह भत्ते के रूप में तथा उस पर मंहगाई भत्ता प्राप्त करेगा। यदि 3 माह से अधिक की अवधि है तो अधिकारी की सन्तष्टि कि निलम्बन रहना आवष्यक है तो उसमें वृद्धि की जा सकती है,परन्त वह पूरे में मिल रहे भत्ते  की 50ः से अधिक नहीं होगी। अतः वेतन के 75ः से अधिक नहीं।

    यदि निलम्बन की अवधि कर्मचारी के उत्तरदायित्व के कारणों से बनती है तो उसके निर्वाह भत्ते को कम करके वेतन का 25ः तक किया जा सकता है। अन्य भते पूरे मिलत  रहेंगे।

    परन्तु कर्मचारी को निर्वाह भता तभी दय होगा जब कर्मचारी यह लिखित प्रमाणपत्र प्रस्तुत करे कि वह इस दौरान अन्य रोजगार, व्यापार या धन्धा नहीं कर रहा है।

    निर्वाह भते से कटौतियां 

    • रेलवे मकान किराया,
    • विद्युत, पानी, सफाई एवं सेश प्रभार,
    • आहार शुल्क,
    • ठका प्रणाली के अनुसार डाॅक्टर का शुल्क,
    • सरकार से लिए गए ऋण एवं अग्रिम की वसूली,
    • आयकर,
    • स्टेशन डेबिट, स्टोर डेबिट एवं कारखाना डेबिट,
    • सरकार को पहुंचायी गयी क्षति, यदि उसे स्थगित नहीं किया गया हो तो, 

    कर्मचारी की लिखित प्रार्थना पर कटौतियां

    • सहकारी समितियों की देयता,
    • इंस्टीटयूट तथा क्लब का सदस्यता शुल्क,
    • जीवन बीमा की किश्त,
    • स्कल शुल्क,
    • भविष्य निधि से लिया गया अग्रिम या एस.बी.एफ. से लिए गए अग्रिम की वापसी निर्वाह भत्ते में स  नही की जाने वाली कटौतियां
    • भविष्य निधि मं अशदान,
    • कोर्ट अटैचमेंट तथा किए गए जर्मान की कटौती,
    • निलम्बन 6 माह से अधिक नहीं होना चाहिये। निलम्बन के दौरान कर्मचारी सक्षम अधिकारी से अनमति लिये बिना अपना मुख्यालय नहीं छोड़ सकता। इस दौरान कर्मचारी की रोजाना हाजरी लेने का कोई प्रावधान नही है।
    • सामान्य रूप से इस दौरान इस्तीफा स्वीकार नहीं किया जायेगा लेकिन यदि नतिक अधमता का मामला नहीं है तो सक्षम अधिकारी स्वीकार कर सकता है।
    छोटी शास्तियां

    1 निन्दा (सेन्श्योर)

    2 नियत अवधि के पदौन्नति पर रोक

    3 कर्मचारी की उपेक्षा या आदेशों के उल्लंघन के कारण प्रशासन को हुए आर्थिक नुकसान की पूरी या आंशिक रकम की वेतन से वसूली

    3(क) सुविधा पास या पी.टी.ओ. अथवा दोनों की सुविधा पर रोक लगाना।

    3(ख) वर्तमान वेतनमान मे एक निचले स्टज पर अवनति- जो तीन वर्ष से अधिक न हो, जिसका भविष्य पर प्रभाव न हो तथा पेंषन पर प्रभाव न हो।

    4 नियत अवधि के लिए वेतन वृद्धि पर रोक, साथ ही इसमें यह निर्दश भी हो कि उक्त अवधि समाप्त होन पर इसका प्रभाव वेतन वृद्धि पर पड़ेगा या नहीं।

    बड़ी शास्तियां

    5 नियत अवधि के लिये वतन क्रम के निचले स्टज पर अवनति, जिसमें यह निर्दश हा कि अवधि के समाप्त होने पर अवनति का प्रभाव भावी वेतनवृद्धि पर होगा अथवा नहीं।

    6 किसी निचले वेतनक्रम, गे्रड, पद या सेवा में अवनति, जिसक  साथ यह निर्देश दिए गए हों कि किन शर्तों पर उस ग्रेड, पद या सेवा पर उसे वापस लिया जा सकेगा अथवा नहीं और वापस लेने पर उसकी वरीयता और वेतन का क्या होगा।

    7 अनिवार्य सेवामुक्ति

    8 सेवा से हटाना (रिमूवल) - जो भविष्य में सरकारी नौकरी के लिए अयोग्यता नहीं होती।

    9 बरर्खास्त करना (पदच्यूति) - जो भविष्य में सरकारी नौकरी के लिए अयोग्यता होती है।

    छोटी शास्ति की कार्यविधि -


    • सबसे पहले यह समझा जाये कि कर्मचारी के द्धारा गलती इस लायक है कि उसे मानक फाॅर्म-11 दिया जाना जरूरी है और केस पक्का हो, इससे सम्बंधित तथ्य सही हो।
    •  इसके पष्चात मानक फाॅर्म-11 में उसके आरोपों का पूर्ण विवरण दकर कर्मचारी को दिया जाए तथा इसमें रेल सेवा आचरण नियम 1966 के नियम 3 के (प) (पप) (पपप) का हवाला दिया जाना चाहिए।
    • कर्मचारी को इस पर अपना प्रतिवेदन देने का 10 दिन का समय दिया जाए।
    • बचाव पत्र प्राप्त होने पर अनुशासिक अधिकारी यह देखता है कि कर्मचारी ने अपने बचाव पत्र में क्या लिखा है। अगर वह संतुष्ट हो तो इसे खत्म भी किया जा सकता है।
    • अगर नहीं तो अधिकारी स्पष्ट रूप से सकारण आदेश लिखता है कि कर्मचारी की क्या गलती है और उसे क्या दण्ड दिया जाना सही है।
    • तत्पष्चात कर्मचारी को एन.आई.पी. (नोटिस फाॅर इम्पोजीशन आॅफ पेनल्टीज) जारी की जाती है उसमें दण्ड का एवं अपील किस अधिकारी को करनी है, पूरा उल्लेख किया जाता है।
    • कर्मचारी को अवसर दिया जाता है कि वह 45 दिन के अन्दर उसे दिये गये दण्ड केविरूद्ध अपील कर सके।
    • अपील पर उच्च अधिकारी ध्यानपूर्वक पढ़कर उसे स्वीकार करके दण्ड मे कमी या समाप्त कर सकता है या बरकरार रख सकता है।
    • अगर कर्मचारी चार्ज षीट का, उसे याद दिलाने के बाद भी कोई उत्तर नही देता है अथवा जाँच इत्यादि में सहयोग नहीं करता है अथवा यह स्पष्ट हो कि सारी प्रक्रिया अपनाने पर भी कर्मचारी को चार्ज शीट प्राप्त करवाना या उसका उत्तर प्राप्त करना संभव नहीं हो पा रहा है तो सार  कारणों को लिखत  हुए अन शासनिक प्राधिकारी एक पक्षीय कार्यवाही करनेका निर्णय ले सकता है।

    बड़ी शास्ति की कार्यविधि -
    • सबसे पहले यह समझा जाये कि कर्मचारी के द्धारा गलती इस लायक है कि उसे मानक फाॅर्म-5 दिया जाना जरूरी है और केस पक्का हो और प्रथम द ष्टया प्रथ्यक्ष हो, इसस सम्बंधित तथ्य सही हो।
    • आरोप पत्र जारी करना - मानक फाॅर्म-5 में आरोपों का पूर्ण विवरण दकर कर्मचारी को आरोप पत्र दिया जाता है जिसमें आरोपों का विवरण, गवाहों की सूची तथा दस्तावेजो की सूची अनलग्नक सहित दिए जाते हैं।
    • कर्मचारी को इस पर अपना प्रतिवेदन देने का 10 दिन का समय दिया जाता है।
    • बचाव प्रतिवेदन पर विचार एव  जाँच के बारे म  निर्णय - पत्र प्राप्त होने पर अनुशासिक अधिकारी यह दखता है कि कर्मचारी ने अपने  बचाव पत्र में क्या लिखा है। अगर वह संतष्ट हो तो इसे खत्म भी किया जा सकता है।
    • जाँच अधिकारी को नामित करना - मानक फाॅर्म-7 द्वारा जांच अधिकारी की नियुक्ति आवश्यकता होने पर की जाती है।
    • जाँच की प्रक्रिया एवं जाच रिपार्ट - तत्पष्चात जांच अधिकारी कर्मचारी के बचाव सलाहकार के साथ, गवाहों, दस्तावेजों आदि से पुष्टि करके जांच पूरी करता है।
    • इसमें कर्मचारी को बचाव के लिए पूरे अवसर दिये जाते है। जांच पूरी करने के बाद जांच अधिकारी आरोप की प्रत्येक मद के सामने  गवाही के दौरान जो तथ्य सामने आये है उसकी समीक्षा करेगा और अपना निष्कर्ष लिखेगा और पूरा कस अनुशासिक अधिकारी के पास भेज देगा। जांच रिर्पोट की एक प्रति कर्मचारी को भी दी जायेगी।
    • जाँच रिपोर्ट पर कार्यवाही - अनुशासनिक अधिकारी रिपोर्ट का अध्ययन करके जांच अधिकारी केनिष्कर्ष पर सहमति या असहमति को रिकाॅर्ड करेगा तथा आवश्यक होने पर गवाहों को बुलाकर उसकी परीक्षा, प्रतिपरीक्षा अथवा कतिपय मुद्दों पर पुनः जाँच के आदेश भी दे सकता है।
    • शास्ति के बारे म निर्णय एवं सकारण आदेश - अनुशासनिक प्राधिकारी जाँच रिपोर्ट के आधार पर, चार्ज शीट के आरोप सिद्ध होते है या नहीं का विचार कर शास्ति के बारे में अपना निर्णय कर सकता है। यदि वह शास्ति उसकी क्षमता में है तो अपना आदेश लिख दगा अन्यथा सक्षम अधिकारी के पास प्रकरण भेज देगा। यह आदेश सकारण आदेश (स्पीकिग आॅर्डर) होने चाहिए।
    • आदेश की सचना कर्मचारी के दना - (एन.आई.पी.) - यह कार्यवाही का अन्तिम चरण है जिसमें शास्ति के आरोपण का उल्लेख होता है तथा अपील किस अधिकारी को की जा सकती है उसकी सूचना होती है। यह कर्मचारी को व्यक्तिगत रूप से प्राप्त कराया जाता है। 
    शास्ति के बाद की प्रक्रिया/कार्यवाही

    अपील

    अपील 45 दिन के भीतर की जानी चाहिये। अपील प्राप्त होने के बाद अपील प्राधिकारी ध्यान से विचार करते हुये उसे खत्म कर सकते है, कम कर सकते है या बढ भी सकते है या दिया गया दण्ड बरकरार रख सकते है।

    नियम 14 में निम्न तीन परिस्थितियाँ उल्लेखित है जिसमें अनुशासन एवं अपील नियम 9 से 13 में उल्लेखित कार्यविधि का पालन करना आवश्यक नहीं होता है और जाँच प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती है। इसमें -

    नियम 14 (1) - यदि कर्मचारी के आचरण के आधार पर फौजदारी के आरोप में उसे सजा हो गई हो तो ऐसे मामलों में कर्मचारी को कारण बताओं नोटिस दिया जाता है। उसके जवाब पर विचार कर उसे पद से हटाना या बर्खास्त करने का निर्णय कर लिया जाता है। पुनः जांच कराना आवश्यक नहीं होता है।

    नियम 14 (2) - जब अनशासनिक प्राधिकारी संतुष्ट हो कि जांच कराना युक्तियुक्त एवं व्यवहारिक नहीं हो तो लिखित में कारण रिकोर्ड कर जांच नहीं कराने का आदेश द सकता है।

    नियम 14 (3) - जब राष्ट्रपति संतुष्ट हो कि राज्य की सुरक्षा के हित में यह यथोचित नहीं है कि नियमों के अनुसार जांच की जाय तो जांच प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती है।

    आदेश जिनके विरूद्ध अपील नहीं की जा सकती -
    • राष्ट्रपति के आदेश के विरूद्ध कोई अपील नहीं की जा सकती है।
    • जो आदेश अन्तरिम प्रकृति के हों।
    • जाँच के दौरान नियमों के अन्तर्गत जाँच अधिकारी के आदेशों के विरूद्ध।
    आदेश जिनके विरूद्ध अपील की जा सकती है -

      • निलम्बन का आदेश
      • शास्ति के आदेश के विरूद्ध
      • शास्ति बढने के आदेश के विरूद्ध
      • प्रतिकल प्रभाव वाले दण्ड  - वेतन, भत्ते, पेन्शन, भविष्य निधि, ग्रेच्युटी इत्यादि कम करने के  आदेश के विरूद्ध
      • स्थानापन्न रूप में काम करते समय पदावनति
      • पेन्शन कम करना या न दना
      • निर्वाह भत्ते के सम्बन्ध में
      • निलम्बन से पुनः बहाली के मामले पर वेतन भत्तों का निर्णय
      • निलम्बन अवधि को पुनः ड्यूटी मानने हेत ु
        अपील -

        आदेश करने वाले अधिकारी से उच्च अधिकारी को की जाती है। 45 दिन की अवधि नियत है इसमें निम्न बिन्द  विशेष रूप से उल्लेखित होते हैं:
        • कर्मचारी स्वयं अपन नाम से अपील प्रस्तुत करे। यूनियन या वकील या बचाव सलाहकार द्वारा अपील नहीं कराई जा सकती।
        • अपील प्राधिकारी को ही लिखित में देना जरूरी होता है।
        • सम्मानजनक भाषा का प्रयोग करे अर्थात कर्मचारी अपन पक्ष में दलीलें नहीं द, न ही व्यक्तिगत रूप से किसी पर कटाक्ष करे।
        • रिमुवल, डिस्मिसल और अनिवार्य सेवा निवृति के मामलों में दसरी अपील करने का प्रावधान भी है।
        • अपील लम्बित रहने के दौरान कर्मचारी न्यायालय में नहीं जा सकता है।
        पुनरीक्षा (रिवीजन)
        • अपील पर निर्णय के पष्चात रिवीजन होता है।
        • अपील न की जाए अथवा अपील का 45 दिन का समय समाप्त होने पर पुनरीक्षा का प्रतिवेदन स्वीकार किया जा सकता है।
        • पुनरीक्षा प्राधिकारी कनिष्ठ प्रशासनिक ग्रेड से नीचे का नहीं होता है।
        • इसमें कर्मचारी निवेदन कर सकता है या सक्षम अधिकारी अपनी ओर से रिवीजन कर सकता है।
        • पुनरीक्षा के बाद के निर्णय में शास्ति को समाप्त करने, कम करने, पुष्टि करन, वृद्धि करन और कोई शास्ति नहीं लगाई गई हो तो शास्ति लगाने का अधिकार सक्षम प्राधिकारी को होता है। यदि शास्ति में वृद्धि होनी हो तो कर्मचारी को युक्तियुक्त अवसर देना आवश्यक होता है।
        पुनर्विलोकन (रिव्यू) 

        राष्ट्रपति के अलावा कोई भी रिव्यू नही कर सकता है। यह तभी किया जा सकता है जब कोई नयी सामग्री या साक्ष्य जानकारी में लाये जाये जो पहले उपलब्ध नहीं थे या प्रस्तुत नहीं किये जा सकते हो और नये सक्ष्य के कारण पूरे केस का स्वरूप ही बदल रहा हो। कर्मचारी का पूरा प्रकरण एवं प्रतिवेदन रेल मंत्रालय को भेजा जाता है। उसके द्वारा नियमानुसार कार्यवाही की जाती है।

        राष्ट्रपति कोई भी निर्णय करने में सक्षम है। यदि शास्ति में वृद्धि होनी हो तो कर्मचारी को अपना प्रतिवेदन देने एवं बचाव का युक्तियुक्त अवसर दिया जाता है।

          रेल दर अधिकरण (रेलवे रेट्स ट्रिबुनल) - रिमुवल, डिस्मिसल एवं अनिवार्य सेवा निवृति पर अपील के बाद ग्रुप ‘सी’ एवं ‘डी’ के रेल कर्मचारी महाप्रबंधक से प्रार्थना कर सकते हैं कि उनका प्रकरण अधिकरण, मद्रासके पास सलाह के लिए अग्रेषित किया जाए। अपील पर निर्णय के बाद 45 दिन तक यह निवेदन किया जा सकता है। इसके लिए अधिकरण के पास प्रकरण के सभी दस्तावेज भेज जाते हैं। लेकिन उल्लेख है कि अधिकरण की सलाह मानना या न मानना महाप्रबंधक के ऊपर निर्भर  है। यदि सलाह नहीं मानने का निर्णय महाप्रबंधक द्वारा लिया जाता है तो इसके कारणों को लिखित में प्रकरण में रिकाॅर्ड करना होता है।

          प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त

          इनका उल्लेख भारतीय संविधान के अनच्छेद 311 में किया गया है जिसका पालन अनुशासनिक कार्यवाहियों में किया जाना आवश्यक होता है। इसके अन्तर्गत कर्मचारी की सुनवाई एवं बचाव के पूरे-पूरे अवसर दिये जाने चाहिये, यह नचुरल जस्टिस है। यह प्रमुख है -
          • कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में स्वयं न्याय नहीं कर सकता है।
          • किसी को बिना सुने अपराधी नहीं मानना चाहिये।
          • सारे निर्णय सदभाव से करने चाहिये।
          • सुनवाई बिल्कुल निष्पक्ष होनी चाहिये।
          • बचाव के लिये सभी प्रकार के अवसर देने चाहिये।
          • निर्णय करने के कारणों की जानकारी अभियुक्त को दना जरूरी है।
          • सारे आरोपों की पहले से जानकारी होनी चाहिये।
          • न्याय केवल किया ही न जाये, यह प्रकट हो कि न्याय किया जा रहा है।
          • गवाहों की प्रति परीक्षा के पूरे अवसर दिये जाने चाहिये।
          • अपराध के अनरूप ही दण्ड दिया जाये।
          • संदह का लाभ आरोपी को दिया जाना चाहिए।
          दण्ड जिनके लिए अनशासनिक कार्यवाही की आवश्यकता नहीं
          • आवश्यक विभागीय परीक्षा में फेल हो जान पर वेतन वृद्धि रोक लेना।
          • पदोन्नति के लिए आयोजित चयन परीक्षा में अनत्तीर्ण हो जाना।
          • पदोन्नति के बाद योग्य न पाया जाना तथा निचले पद पर अवनति करना।
          • प्रोबेशन पीरीयड नियमानुसार सफलतापूर्वक पूरा नहीं करने पर अवनति।
          • सेवा मुक्ति नियमोंके तहत अनिवार्य सेवा निवृति।
          • प्रोबेशन या दसरी शर्तों की अनपालना न कर पाने पर पद से हटाया जाना।
          • दक्षतारोध पार नहीं करने पर वेतन वृद्धि को रोकना - पांचवे वेतन आयोग न े दक्षतारोध को हटा दिया गया है।
          • कार्यक्षमता में कमी, शारीरिक निर्योग्यता, पद समाप्त होना इत्यादि कारणों से पद से हटाना अथवा दसरे पद पर समाहित करना।
          • विभागीय परीक्षा में अनत्तीर्ण होन पर पद से अवनति।
          • तदर्थ आधार पर पदोन्नति होने के बाद कतिपय कारणों से पुराने पद पर अवनति।
          • स्वयं की प्रार्थना पर निचले वेतनमान के पद पर अवनति/स्थानान्तरण तथा उससे वेतन में कमी।

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